सनातन परंपरा में परिक्रमा का महत्व: आस्था, अनुशासन और आध्यात्मिक ऊर्जा का संगम
संचिता सुषमा वालके
सनातन परंपरा में परिक्रमा का महत्व: आस्था, अनुशासन और आध्यात्मिक ऊर्जा का संगम सनातन धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक गहन और व्यवस्थित पद्धति है, जिसमें हर कर्म के पीछे एक आध्यात्मिक और वैज्ञानिक आधार निहित होता है। इन्हीं परंपराओं में से एक महत्वपूर्ण परंपरा है परिक्रमा—जो श्रद्धा, समर्पण और ऊर्जा के संतुलन का प्रतीक मानी जाती है। परिक्रमा का अर्थ है किसी देवता, मंदिर या पवित्र स्थान के चारों ओर घूमना। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण और अपने अहंकार के परित्याग का प्रतीक है। सनातन धर्म में विभिन्न देवी-देवताओं के लिए परिक्रमा की संख्या भी अलग-अलग निर्धारित की गई है, जो अपने आप में विशेष महत्व रखती है। भगवान शिव की उपासना में परिक्रमा का विशेष नियम है। शिवलिंग की आधी या एक परिक्रमा की जाती है, लेकिन इसके दौरान शिवलिंग के पीछे नहीं जाया जाता। इसका कारण यह माना जाता है कि शिवलिंग के पीछे का भाग जलाधारी होता है, जहाँ से पवित्र जल प्रवाहित होता है, और उस स्थान को पार करना अनुचित माना जाता है। यह परंपरा हमें मर्यादा और सम्मान का पाठ सिखाती है। वहीं भगवान विष्णु की चार परिक्रमा करने का विधान है, जो जीवन के चार पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—का प्रतीक मानी जाती है। यह हमें संतुलित और सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा देती है। माता दुर्गा की एक या नौ परिक्रमा की जाती है। नौ परिक्रमा नवदुर्गा के स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करती है और शक्ति, साहस तथा आत्मविश्वास का संचार करती है। यह परिक्रमा नारी शक्ति और ऊर्जा के प्रति सम्मान को भी दर्शाती है। भगवान गणेश, जो विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता माने जाते हैं, उनकी तीन परिक्रमा करने का विधान है। यह त्रिगुण—सत्व, रज और —का प्रतीक है, और जीवन में संतुलन बनाए रखने का संदेश देती है। सूर्य देव की सात परिक्रमा की जाती है, जो सप्ताह के सात दिनों और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। सूर्य को ऊर्जा, प्रकाश और जीवन का स्रोत माना गया है, इसलिए उनकी परिक्रमा स्वास्थ्य और सकारात्मकता से भी जुड़ी हुई है। इन सभी नियमों के पीछे एक सामान्य सिद्धांत यह है कि परिक्रमा हमेशा श्रद्धा, शांति और एकाग्र मन से करनी चाहिए। यह केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि आत्मिक साधना है, जो व्यक्ति को भीतर से सशक्त बनाती है। अंततः, सनातन धर्म की ये परंपराएँ हमें यह सिखाती हैं कि आस्था के साथ-साथ अनुशासन और समझ भी आवश्यक है। परिक्रमा के माध्यम से हम न केवल ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करते हैं, बल्कि अपने जीवन को भी संतुलित, सकारात्मक और ऊर्जावान बनाने की दिशा में एक कदम बढ़ाते हैं।
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