संचिता सुषमा वालके

17 अप्रैल का दिन भारतीय बौद्धिक परंपरा के एक उज्ज्वल सितारे, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पुण्यतिथि के रूप में हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। वे केवल भारत के द्वितीय राष्ट्रपति ही नहीं थे, बल्कि एक ऐसे दार्शनिक, शिक्षाविद और चिंतक थे जिन्होंने शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का सबसे सशक्त साधन माना।डॉ. राधाकृष्णन का जीवन इस सत्य का प्रमाण था कि शिक्षा केवल ज्ञान का संचय नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का निर्माण है। उनका मानना था कि एक सच्चा शिक्षक वही है जो स्वयं भी निरंतर सीखता रहे। यही कारण है कि उन्होंने शिक्षक की भूमिका को समाज में सबसे ऊँचा स्थान दिया। उनके जन्मदिवस (5 सितंबर) को “शिक्षक दिवस” के रूप में मनाया जाना, उनके प्रति देश की कृतज्ञता का प्रतीक है। आज जब शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और ज्ञान का दायरा तकनीक तक सीमित होता जा रहा है, ऐसे समय में राधाकृष्णन के विचार और अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं। उन्होंने शिक्षा को नैतिकता, मानवता और आध्यात्मिकता से जोड़ने की बात कही थी। उनके अनुसार, यदि शिक्षा में मूल्य नहीं हैं, तो वह समाज को दिशा देने में असफल हो जाती है। उनकी दृष्टि में शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शक होता है। वह विद्यार्थियों में जिज्ञासा, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का भाव जगाता है। आज के दौर में, जब सूचना की भरमार है परंतु विवेक का अभाव दिखाई देता है, तब राधाकृष्णन की शिक्षाएं हमें संतुलन और सही दिशा प्रदान करती हैं। डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित किया। उन्होंने पूर्व और पश्चिम के विचारों के बीच सेतु का कार्य किया और यह दिखाया कि भारतीय संस्कृति कितनी गहन और व्यापक है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि ज्ञान का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि समाज और मानवता की सेवा होना चाहिए। उनकी पुण्यतिथि पर हमें केवल श्रद्धांजलि अर्पित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेना चाहिए। यदि हम शिक्षा को केवल रोजगार का साधन न मानकर चरित्र निर्माण का माध्यम बनाएँ, तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को कोटि-कोटि नमन
उनकी विचारधारा सदैव हमें प्रेरित करती रहेगी।